उत्तराखंड में SC के अपमान के कारण भाजपा और कांग्रेस का टकराव: जानें पूरी कहानी
देहरादून खबर संसार.आखिर किस खास कारण से उत्तराखंड में SC के अपमान का लेकर बीजेपी कांग्रेस भिड़ी पड़ी है क्या है इसका राज, जी हा. चुनाव आयोग की ओर से उत्तराखंड में कुल 70 विधानसभा सीटें हैं इनमें से 13 विधानसभा सीट एससी के लिए आरक्षित रखी गई है जबकि 2 विधानसभा सीट एसटी के […] The post आखिर किस खास कारण से उत्तराखंड में SC के अपमान का लेकर बीजेपी कांग्रेस भिड़ी पड़ी है क्या है इसका राज appeared first on Khabar Sansar News.
उत्तराखंड में SC के अपमान के कारण भाजपा और कांग्रेस का टकराव: जानें पूरी कहानी
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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड में समाज के विशेष वर्ग को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच की राजनीतिक लड़ाई ने एक नया मोड़ ले लिया है। राज्य में 70 विधानसभा सीटों में से 13 सीटें अनुसूचित जातियों (SC) के लिए आरक्षित की गई हैं, जबकि 2 सीटें अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए आरक्षित हैं। यह स्थिति दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच वोट बैंक की राजनीति को लेकर तनाव की वजह बन गई है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
उत्तराखंड में केंद्र सरकार द्वारा घोषित विधानसभा चुनावों के कारण यहां की राजनीतिक वातावरण काफी गर्म है। चुनाव आयोग की ओर से घोषित चुनावी नीतियों का अनुसरण करते हुए, SC और ST के मुद्दे को लेकर दोनों पार्टियों ने अपनी स्थिति तय की है। इनमें से SC के लिए आरक्षित सीटों का वोटिंग प्रतिशत 19% है, जबकि मुस्लिम वोटरों का प्रतिशत 14% है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ये समुदाय भी चुनावी रणनीतियों में महत्वपूर्ण हैं।
आरक्षित सीटों की जानकारी
उत्तराखंड में SC के लिए आरक्षित सीटें निम्नलिखित हैं:
- उत्तरकाशी - पुरोला, थराली, घनशाली
- देहरादून - राजपुर रोड
- हरिद्वार - ज्वालापुर, भगवानपुर, झबरेड़ा
- पौड़ी - गंगोलीहाट
- पिथौरागढ़ - गंगोलीहाट
- बागेश्वर - 10 सीट
- सोमेश्वर
- नैनीताल - बाजपुर
वहीं ST के लिए आरक्षित सीटें चकराता और नानकमत्ता हैं। ये सीटें अब ज्यादा अहमियत रखती हैं, खासकर जब से दोनों पार्टियां इन समुदायों के बीच अपनी स्थिति मजबूत बनाने की कोशिश कर रही हैं।
भाजपा और कांग्रेस के राजनीतिक दांव
भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस मुद्दे को आधार बनाकर आगामी 2027 विधानसभा चुनावों में बढत बनाने की कोशिश में हैं। भाजपा ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाप के हिसाब से आरक्षित सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा की है जबकि कांग्रेस अपनी पार्टी की ऊंची जातियों का भी सहारा लेकर वोट बैंक साधने की योजना बना रही है।
इस राजनीतिक टकराव ने अनुसूचित जातियों के प्रति संवेदनशीलता को भी सामने लाया है, जिससे यह मुद्दा केवल चुनावी नतीजों का नहीं, बल्कि समाज के हाशिए पर खड़े लोगों के अधिकारों का भी बन गया है।
आगे की राह
केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की नीतियों का पालन करते हुए, अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन सी पार्टी SC समुदाय से अधिक समर्थन जुटा पाती है। इन दोनों दलों के बीच की प्रतिस्पर्धा ने राजनीतिक वातावरण को इतना गर्म कर दिया है कि यह मुद्दा लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहेगा।
राजनीति में इस प्रकार का टकराव न केवल चुनावी मुकाबले को प्रभावित करेगा, बल्कि यह समाज में जाति के आधार पर विभाजन को भी और गहरा कर सकता है। ऐसे में जनता के बीच जागरूकता फैलाना और चुनावी ताकतों का सही उपयोग करना आवश्यक है।
अंत में, जब चुनावी महासमर की बात आती है, तो अनुसूचित जातियों की महत्वपूर्ण भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। इसलिए, हमें देखना होगा कि ये मुद्दे किस तरह से आगामी चुनावों के परिणामों पर प्रभाव डालते हैं।
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— कविता शर्मा, Team PWC News
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