करन माहरा ने धामी सरकार को घेरते हुए किसान खुदकुशी मामले पर उठाए सवाल
उत्तराखंड कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष करन माहरा ने धामी सरकार पर तीखा हमला बोला है।...
करन माहरा ने धामी सरकार को घेरते हुए किसान खुदकुशी मामले पर उठाए सवाल
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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष करन माहरा ने धामी सरकार पर तीखा आरोप लगाते हुए किसानों के आत्महत्या मामले को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
उत्तराखंड कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष करन माहरा ने धामी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि ऊधमसिंह नगर के किसान स्वर्गीय सुखवंत सिंह की आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की निजी त्रासदी नहीं, बल्कि धामी सरकार के तथाकथित “सुशासन” पर सवाल खड़ा करती है। उन्होंने जोर दिया कि एक ऐसा किसान, जिसने सिस्टम की बेरुखी और पुलिस-प्रशासन की लापरवाही के कारण अपने आप को समाप्त कर लिया, यह राज्य के प्रत्येक नागरिक के लिए एक झकझोर देने वाला सच है।
करन माहरा ने कहा कि सबसे चिंताजनक और शर्मनाक पहलू यह है कि मृतक किसान ने जिन अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए थे, उन्हीं के अधीन अब जांच का नाटक किया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह न्याय है या सरकार का निर्लज्ज मज़ाक? उन्होंने कहा, "उत्तराखंड की जनता इतनी भोली नहीं है कि यह समझ न सके कि आरोपी की छाया में कभी निष्पक्ष जांच संभव नहीं है। यह तो वही स्थिति हो गई मानो न्याय की कुर्सी पर वही बैठा हो, जिस पर उंगली उठी है।"
उन्होंने धामी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार बड़े-बड़े पोस्टरों और खोखली घोषणाओं के माध्यम से सुशासन का प्रचार करती है, लेकिन धरातल की सच्चाई यह है कि किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। यदि पुलिस-प्रशासन जवाबदेह होता और शासन संवेदनशील होता, तो सुखवंत सिंह को आत्महत्या का कदम उठाने की नौबत नहीं आती। उनकी मौत सरकार की असंवेदनशीलता, अहंकार और ग़ैरजिम्मेदारी का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
करन माहरा का कहना है कि यह मामला केवल एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे उत्तराखंड के सम्मान, संवेदना और किसानों के भविष्य का सवाल है। उन्होंने कहा, "जब एक किसान मरने से पहले सिस्टम को कटघरे में खड़ा करता है और मरने के बाद वही सिस्टम जांचकर्ता बन जाता है, तो जनता आखिर किस आधार पर भरोसा करेगी?" इसके साथ ही, उन्होंने सुझाव दिया कि यदि सरकार सच में न्याय चाहती है, तो इसे शीघ्र यह जांच सीबीआई या किसी बाहरी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपनी चाहिए और जिन अधिकारियों पर आरोप हैं, उन्हें जांच प्रक्रिया से पूरी तरह दूर करना चाहिए।
करन माहरा ने उत्तराखंड के लोगों से यह भी सवाल किया कि "क्या किसान की जान इतनी सस्ती है? क्या सत्ता में बैठे लोगों के लिए जवाबदेही नाम की कोई चीज़ बची है?" उन्होंने चेताया कि जब तक इस मामले की ईमानदार, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच नहीं होती, तब तक यह स्पष्ट रहेगा कि धामी सरकार किसानों के साथ नहीं, बल्कि सिस्टम के दोषियों के साथ खड़ी है। यह चुप्पी और दिखावा वास्तव में सरकारी असंवेदनशीलता का परिणाम है।
अंत में, माहरा ने कहा कि पूरे उत्तराखंड की जनता को एकजुट होकर इस मुद्दे पर आवाज उठानी चाहिए और सरकार से जवाब मांगना चाहिए कि आखिर कब तक वे किसानों की कठिनाइयों को नजरअंदाज करेंगे। उचित कार्रवाई और जिम्मेदारी के साथ ही उत्तराखंड में किसानों की जिंदगी और भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है।
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सादर, टीम PWC News - स्नेहा शर्मा
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