जनरल खंडूरी का व्यक्तित्व और उनके कार्यशैली का आलोकन: प्रोफेसर प्रदीप वेदवाल की दृष्टि

स्मृति शेष भुवन चंद्र खण्डूड़ी कुछ बातें,कुछ यादें प्रोफेसर प्रदीप कुमार वेदवाल गढ़वाल लोकसभा सीट...

May 20, 2026 - 09:53
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जनरल खंडूरी का व्यक्तित्व और उनके कार्यशैली का आलोकन: प्रोफेसर प्रदीप वेदवाल की दृष्टि

जनरल खंडूरी का व्यक्तित्व और उनके कार्यशैली का आलोकन: प्रोफेसर प्रदीप वेदवाल की दृष्टि

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कम शब्दों में कहें तो, यह लेख जनरल भुवन चंद्र खंडूरी के व्यक्तित्व, कार्यशैली और उनकी विरासत को विस्तार से समझाता है। प्रोफेसर प्रदीप वेदवाल को उनके साथ बिताए गए अनुभवों के माध्यम से समझना है, जो कि गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र को लेकर इतिहास में महत्वपूर्ण रहे हैं।

गढ़वाल की राजनीति में मेरी रुचि बचपन से ही गहरी रही है। अस्सी के दशक में हेमवती नंदन बहुगुणा के “तराजू” चुनाव चिन्ह वाले पोस्टर को मैंने अपने घर के छज्जे पर चिपकाया करते थे। 1984 और 1989 के चुनावों में, जब मैं गढ़वाल से बाहर था, तब भी चंद्रमोहन सिंह नेगी जैसे नेताओं की चमक ने मुझे आकर्षित किया।

जब 90 के दशक में देश में राम लहर चल रही थी, तो उत्तर प्रदेश के पर्वतीय जिला भी इससे अछूते नहीं रहे। टिहरी लोकसभा से महाराजा मानवेंद्र शाह, गढ़वाल से मेजर जनरल खंडूरी और अन्य कई भाजपा नेताओं ने चुनकर आकर उत्तर प्रदेश के पर्वतीय इलाकों में पार्टी की नींव को मजबूती दी।

नब्बे के दशक में, जब बीजेपी एक रुपये का सदस्य बना रही थी, तब अपने गांव के कक्कू नैथानी को पार्टी में शामिल करना कठिन था। तब मैंने कहा कि इस कार्य को मुझे सौंप दो, लेकिन अंत में मैं केवल दो सदस्य ही बना सका, जो उन कठिनाईयों की याद दिलाती हैं।

खंडूरी की राजनीति और कार्यशैली

1991 में जब सेवानिवृत्त मेजर जनरल खंडूरी गढ़वाल लोकसभा से मामूली कौशल से चुने गए, तब से उनकी कार्यशैली में अद्वितीयता थी। लोकसभा में मुख्य सचेतक रहना हो या अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में अवैतनिक सड़क एवं परिवहन राज्य मंत्री, मेरी नजर में हर दायित्व को उन्होंने कुशलतापूर्वक निभाया।

मुझे याद है 3 मार्च 1993 का दिन, जब हम दिल्ली के गढ़वाल भवन में वार्षिक उत्सव मना रहे थे। खंडूरीजी समय के प्रति कितने पाबंद थे, यह मैंने उस दिन साफ तौर पर महसूस किया। दरअसल, उनकी वक्त की कद्र ने मुझ पर गहरा प्रभाव छोड़ा।

याद आता है दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम का आयोजन। उस दौरान, कवि कैलाश धस्माना को खंडूरीजी के सामने अपने विचार रखने का अवसर मिला। जब उन्होंने उत्तराखंड की समस्याओं के बारे में प्रश्न किया, तब खंडूरीजी ने एकता और राज्य के निर्माण के लिए आंदोलन की बात की।

राजनीति में खंडूरी का योगदान

खंडूरीजी ने उत्तराखंड राज्य जिन्ना आंदोलन के दौरान एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1996 के चुनावों में, उन्होंने और उनकी पार्टी ने “राज्य नहीं तो चुनाव नहीं” का नारा दिया, जिसने काफी प्रभाव डाला।

केंद्रीय मंत्री बनने के बाद भी, उन्हें याद है कि उन्होंने राज्य के निर्माण के लिए कई बार प्रयास किए। उन्होंने साक्षरता के माध्यम से इस मुद्दे को संबोधित किया। 2004 के चुनावों में, जब एनडीए की सरकार का पतन हुआ, तब भी खंडूरीजी गढ़वाल से सांसद रहे और उन्होंने कार्यों में अपनी ईमानदारी को बनाए रखा।

भुवन चंद्र खंडूरी मेरी दृष्टि में एक ऐसे राजनेता रहे हैं जो दिल और दिमाग से नेक और ईमानदार थे। आज उनके निधन पर, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की अनेक बातें स्मरण हो रही हैं। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।

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Team PWC News - निधि शर्मा

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