उत्तराखण्ड में यूसीसी संशोधन अध्यादेश को मिली राजभवन से मंजूरी

उत्तराखण्ड सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता (UCC) उत्तराखण्ड, 2024 में आवश्यक संशोधनों हेतु समान नागरिक...

Jan 27, 2026 - 09:53
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उत्तराखण्ड में यूसीसी संशोधन अध्यादेश को मिली राजभवन से मंजूरी

उत्तराखण्ड में यूसीसी संशोधन अध्यादेश को मिली राजभवन से मंजूरी

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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखण्ड सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता (UCC) के आवश्यक संशोधन हेतु अध्यादेश को राज्यपाल की स्वीकृति मिल गई है।

राज्य सरकार ने समान नागरिक संहिता (UCC) उत्तराखण्ड 2024 में आवश्यक संशोधनों हेतु समान नागरिक संहिता (संशोधन) अध्यादेश, 2026 को लागू करने की प्रक्रिया को संपन्न कर लिया है। यह अध्यादेश संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) द्वारा लागू किया गया है, और इसे तत्काल प्रभाव से लागू करने की अनुमति दी गई है।

इस नये अध्यादेश के माध्यम से समान नागरिक संहिता के कई प्रावधानों में महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक, प्रशासनिक, तथा दंडात्मक सुधार किए गए हैं। यह सुधार UCC के प्रभावी, पारदर्शी और सुचारु क्रियान्वयन को सुनिश्चित करेंगे। संशोधनों का मुख्य लक्ष्य UCC के अंतर्गत अधिकारों को अधिक स्पष्ट, प्रभावी और व्यावहारिक बनाना तथा प्रशासनिक दक्षता को सुदृढ़ करना है।

इन संशोधनों में आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 के स्थान पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 तथा दंडात्मक प्रावधानों को लागू करने के लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 को शामिल किया गया है। इसके अलावा, धारा 12 के अंतर्गत 'सचिव' के स्थान पर 'अपर सचिव' को सक्षम प्राधिकारी नामित किया गया है।

अगर उप-पंजीयक द्वारा निर्धारित समय-सीमा में कार्रवाई नहीं की जाती है। तो ऐसे प्रकरण स्वतः पंजीयक तथा पंजीयक जनरल को अग्रेषित किए जाएंगे। इसके अलावा, उप-पंजीयक पर लगाए गए दंड के खिलाफ अपील करने का अधिकार भी प्रदान किया गया है, और दंड की वसूली भू-राजस्व की भांति करने का प्रावधान जोड़ा गया है।

संशोधन में विवाह के समय पहचान से संबंधित गलत प्रस्तुति को विवाह निरस्तीकरण का आधार माना गया है। विवाह और लिव-इन संबंधों में बल, दबाव, धोखाधड़ी, या विधि-विरुद्ध कृत्यों के लिए कठोर दंडात्मक प्रावधान सुनिश्चित किए गए हैं। लिव-इन संबंध की समाप्ति पर पंजीयक द्वारा समाप्ति प्रमाण पत्र जारी किए जाने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा, अनुसूची-2 में 'विधवा' शब्द के बजाय 'जीवनसाथी' शब्द का उपयोग किया गया है। विवाह, तलाक, लिव-इन संबंध और उत्तराधिकार से संबंधित पंजीकरण को निरस्त करने का अधिकार पंजीयक जनरल को दिया गया है।

इस अध्यादेश के द्वारा सरकार ने नागरिकों के अधिकारों को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है जिससे सामाजिक न्याय को भी बढ़ावा मिलेगा। इसके अंतर्गत शादी, तलाक एवं लिव-इन संबंधों से संबंधित मामलों में कानूनी प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने का प्रयास है। यदि किसी को कोई समस्या होती है तो वह न केवल अपीलीकरण कर सकते हैं, बल्कि सभी मामलों का समाधान पारदर्शिता से किया जाएगा।

यह अध्यादेश एक महत्वपूर्ण कदम है जो न केवल समान नागरिक संहिता को प्रभावी बनाएगा, बल्कि उत्तराखण्ड में नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण के लिए भी एक मजबूत बुनियाद रखेगा। आगे की सूचनाओं के लिए, विजिट करें PWC News.

टीम PWC News

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