उत्तराखण्ड का भाषा परिवार: हिमालय के लोकवृत्त पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन

उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी; उत्तराखण्ड भाषा संस्थान, देहरादून एवं केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के संयुक्त तत्वावधान में “हिमालय के लोकवृत्त में उत्तराखण्ड का भाषा परिवार” विषयक द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ विश्वविद्यालय परिसर में हुआ। संगोष्ठी की शुरुआत पुस्तक मेले के उद्घाटन से हुई, जिसका उद्घाटन प्रसिद्ध भाषाविद् प्रो. वी. आर. जगन्नाथन ने किया। इस […] The post हिमालय के लोकवृत्त में उत्तराखण्ड का भाषा परिवार” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आरंभ appeared first on Khabar Sansar News.

Oct 31, 2025 - 00:53
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उत्तराखण्ड का भाषा परिवार: हिमालय के लोकवृत्त पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन

उत्तराखण्ड का भाषा परिवार: हिमालय के लोकवृत्त पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन

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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी, उत्तराखण्ड भाषा संस्थान, देहरादून और केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के द्वारा “हिमालय के लोकवृत्त में उत्तराखण्ड का भाषा परिवार” विषय पर द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। यह समारोह एक पुस्तक मेले के उद्घाटन के साथ शुरू हुआ, जिसमें भाषाविद् प्रो. वी. आर. जगन्नाथन ने मुख्य अतिथि के रूप में हिस्सा लिया।

संगोष्ठी की विशेषताएँ

संगोष्ठी का आयोजन विश्वविद्यालय परिसर में किया गया, जिसमें कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने भाग लिया। कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी, पूर्व कुलपति प्रो. जगत सिंह बिष्ट, वरिष्ठ कुमाऊनी साहित्यकार प्रो. देव सिंह पोखरिया और हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. जितेन्द्र श्रीवास्तव उपस्थित थे।

कार्यक्रम की शुरुआत में संगीत विभाग द्वारा प्रस्तुत समूहगान “उत्तराखण्ड मेरी मातृभूमि” ने एक सांस्कृतिक अलंकरण प्रदान किया, जो समारोह के लिए एक उज्ज्वल वातावरण तैयार करता है।

विशेष वक्तव्य एवं चर्चाएँ

संगोष्ठी के दौरान, प्रो. गिरिजा प्रसाद पांडे ने स्वागत भाषण देते हुए उत्तराखण्ड की भाषाई विविधता और लुप्त होती भाषाओं के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि भारत की भाषाएँ एक-दूसरे को जोड़ती हैं और उनका संरक्षण आवश्यक है।

समारोह के संयोजक डॉ. शशांक शुक्ल ने विषय-प्रवर्तन करते हुए कहा कि समय आ गया है कि बोली और भाषा के बीच के कृत्रिम भेद को समाप्त किया जाए। उन्होंने प्रतिभागियों को आह्वान किया कि वे भाषाई एकता की दिशा में एकजुट हों।

प्रमुख विचारशीलता

प्रो. वी. आर. जगन्नाथन ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि “हिंदी की विविध बोलियाँ उसकी जीवंतता का प्रमाण हैं। क्षेत्रीय भाषाओं के बीच संवाद से न केवल राष्ट्रीय एकता, बल्कि भाषाई विकास भी होगा।” इसी तरह, प्रो. जितेन्द्र श्रीवास्तव ने यह स्पष्ट किया कि “भारत की भाषाएँ जोड़ती हैं, काटती नहीं; हिंदी को क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्र की भाषा के रूप में देखा जाना चाहिए।”

प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ने भाषाई विवादों से ऊपर उठकर रचनात्मकता और साहित्यिक समरसता पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि “हिमालय का लोकवृत्त भाषा की दृष्टि से बहुत विस्तृत है; उत्तराखण्ड की 14 प्रमुख एवं जनजातीय भाषाओं के संरक्षण की आवश्यकता है।”

मुख्य अतिथि का संबोधन

मुख्य अतिथि श्री गजराज सिंह बिष्ट (महापौर, हल्द्वानी) ने कार्यक्रम में अंग्रेजी भाषा के प्रभुत्व और उसके सांस्कृतिक प्रभाव पर चर्चा की। प्रो. सुनील कुलकर्णी (निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा) ने वर्चुअल संबोधन के माध्यम से घटती भाषाओं के संरक्षण हेतु नीतिगत प्रयासों को अनिवार्य बताया।

इस अवसर पर श्री प्रकाश चन्द्र तिवारी की कहानी-संग्रह “किरायेदार” का भी लोकार्पण किया गया, जोकि साहित्य जगत में एक महत्वपूर्ण योगदान है।

आगे की कार्यवाही और सत्र

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा— “क्षेत्रीय भाषाएँ हमारी सांस्कृतिक अस्मिता की आत्मा हैं। शिक्षा के माध्यम से भाषाओं को जनसामान्य तक पहुँचाना हमारी जिम्मेदारी है।”

सत्र का संचालन डॉ. अनिल कार्की ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राजेन्द्र कैड़ा ने प्रस्तुत किया। समानांतर सत्रों में प्रो. प्रभा पंत, प्रो. चन्द्रकला रावत, प्रो. देव सिंह पोखरिया, डॉ. नंद किशोर हटवाल, श्री गणेश खुगशाल ‘गणि’, श्री रमाकांत बैंजवाल, श्री मुकेश नौटियाल जैसे वक्ताओं ने भाग लिया।

भाषाओं का संरक्षण

इन सत्रों में कुमाऊँनी, गढ़वाली, दनपुरिया, रं, राजी, थारू, जौनसारी, बुक्सा, बाँगाणी, रंवाल्टी आदि भाषाओं के संरक्षण, डिजिटल दस्तावेजीकरण और पीढ़ीगत हस्तांतरण पर व्यापक चर्चा हुई। यह संगोष्ठी उत्तराखण्ड की भाषाई धरोहर को संरक्षित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है और प्रदेशभर के भाषाविद्, साहित्यकार, शोधार्थी एवं विश्वविद्यालय परिवार के सदस्य इस समारोह में उपस्थित रहे।

इस प्रकार, यह संगोष्ठी हमारे समृद्ध भाषाई एवं सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करती है।

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सादर,

टीम पीडब्ल्यूसी न्यूज

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