श्रीदेवताल–माणा पास यात्रा: हिमालय की लोकधरोहरों से जुड़ने का अनूठा अनुभव
देहरादून: भारत–तिब्बत (चीन) सीमा पर स्थित 18,500 फीट की ऊँचाई वाले श्रीदेवताल–माणा पास क्षेत्र में आयोजित लोकविरासतीय सीमा दर्शन यात्रा मंगलवार को संपन्न हुई। इस वर्ष घस्तोली से माणा पास तक हाल ही में हुई बर्फबारी से सड़क मार्ग क्षतिग्रस्त होने के कारण यात्रा को देवताल के स्थान पर नागताल में पूर्ण किया गया। उत्तराखंड […] The post श्रीदेवताल–माणा पास लोकविरासतीय सीमा दर्शन यात्रा संपन्न, हिमालय की लोकधरोहरों से जुड़ने और राष्ट्रभाव को सशक्त करने का संदेश appeared first on Devbhoomisamvad.com.
श्रीदेवताल–माणा पास यात्रा संपन्न: राष्ट्रभाव को सशक्त करने का संदेश
देहरादून: भारत–तिब्बत (चीन) सीमा पर स्थित 18,500 फीट की ऊँचाई वाले श्रीदेवताल–माणा पास क्षेत्र में आयोजित लोकविरासतीय सीमा दर्शन यात्रा मंगलवार को सफलतापूर्वक संपन्न हुई। इस वर्ष घस्तोली से माणा पास तक हाल ही में हुई भारी बर्फबारी के कारण सड़क मार्ग में बाधा आई, जिसके चलते यात्रा को देवताल के स्थान पर नागताल में समाप्त किया गया।
कम शब्दों में कहें तो, यह यात्रा न सिर्फ हिमालय की अद्भुत खूबसूरती को देखने का अवसर प्रदान करती है, बल्कि यह केन्द्रीय सरकार के ‘सीमा विकास योजनाओं’ को भी सशक्त करती है।
उत्तराखंड के वरिष्ठ नागरिक कल्याण परिषद के अध्यक्ष रामचंद्र गौड़ के नेतृत्व में आयोजित इस यात्रा में प्रशासन ने मार्ग की विषमता के मद्देनजर केवल 15 यात्रियों को अनुमति दी थी। श्री गौड़ ने इस यात्रा के महत्व पर बल देते हुए कहा कि हिमालय का निकटता से अनुभव करने के लिए ऐसी यात्राएं आवश्यक हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया कि यह यात्रा प्रतिवर्ष वरिष्ठ नागरिकों के लिए निशुल्क रूप से आयोजित की जाए ताकि अधिक से अधिक लोग इसका लाभ उठा सकें।
यात्रा का ऐतिहासिक महत्व
यात्रा के संयोजक प्रो. (डॉ.) सुभाष चंद्र थलेड़ी ने बताया कि इस यात्रा की शुरुआत वर्ष 2015 में स्वर्गीय मोहन सिंह रावत ‘गांववासी’, पूर्व कैबिनेट मंत्री, उत्तराखंड द्वारा की गई थी। तब से यह यात्रा उनके प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है। भविष्य में इस यात्रा को नीति घाटी, टिम्मरसैंण की अमरनाथ गुफा और रिमखिम जैसे धार्मिक स्थलों से भी जोड़ा जाएगा।
यात्रा के संरक्षक पं. भास्कर डिमरी ने जानकारी देते हुए बताया कि श्रीदेवताल सरोवर, जो पवित्र सरस्वती नदी का उद्गम स्थल है, इसे विश्व की सबसे ऊँचाई पर स्थित झील माना जाता है। इसकी पवित्रता कैलाश मानसरोवर के समान मानी जाती है। उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र 1962 के बाद बंद था, लेकिन स्व. ‘गांववासी’ जी के प्रयासों से 2015 में जिला प्रशासन और सेना की अनुमति से यात्रा का पुनः शुभारंभ किया गया।
सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण
इस यात्रा में डा. नीरज नैथानी, एक प्रसिद्ध कवि, ने सीमांत क्षेत्रों की सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण पर बल देते हुए अपनी कविता “क्या तुमने कभी किसी चट्टान से बात की है…” के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। बदरीनाथ के व्यवसायी और सामाजिक कार्यकर्ता राजेश नंबूरी एवं लखनऊ के राजेश राय ने यात्रा के उद्देश्य और हिमालय की सुरक्षा पर अपने विचार रखे।
यात्रा की शुरुआत परंपरानुसार श्री बदरीनाथ धाम के ध्वज (बदरीध्वज) की अगुवाई में की गई, जिसे बदरीनाथ के रावल द्वारा पं. भास्कर डिमरी को सौंपा गया। पूरी यात्रा के दौरान आईटीबीपी और भारतीय सेना के जवानों ने सहयोग और मार्गदर्शन प्रदान किया, जबकि असम रेजिमेंट ने यात्रियों का स्वागत किया।
आभार और समापन
इस यात्रा में नवीन थलेड़ी, संजीव कंडवाल, जितेंद्र कुमार, राहुल, बिक्रम लाल शाह एवं अन्य तीर्थयात्री शामिल रहे। आयोजन समिति ने जिला प्रशासन और सेना के सहयोग के प्रति आभार व्यक्त किया।
प्रो. थलेड़ी ने इस यात्रा की महत्वता को दर्शाते हुए कहा कि यह न केवल हिमालयी लोकधरोहरों के संरक्षण और सांस्कृतिक चेतना के संवर्धन की दिशा में एक कदम है, बल्कि यह स्व. मोहन सिंह रावत ‘गांववासी’ जी की स्मृति में राष्ट्रभाव को सशक्त करने का प्रतीक बन चुकी है।
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सादर, टीम PWC News - नीतिका शर्मा
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